पुरुष शत्रु नहीं मित्र हैं!

नारी की कहानी एक प्रयत्न ताकि एक मनुष्य (पुरुष) और दूसरे मनुष्य (महिला) में मन, कर्म, वचन का कोई भेद न रहे. ताकि हर संकीर्ण सोच पर पार पाकर सच्चा समाज स्थापित हो सके, और वर्षों से नारी पर डाली गयी धर्म, रिवाजों और समाज के बेडियाँ तोड़ कर बराबरी का हक़ मिले... प्रयत्न आपकी सहभागिता के बिना अधुरा है.. आपके सहयोग की लालसा में..

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Tuesday, June 30, 2009

यहाँ पेशाब करना मना है (सिर्फ पुरुषों के लिए)!!!

चौंक गये... ?
अजी बात ही कुछ ऐसी है. दरअसल बहुत दिनों से मेरे मन में एक बात उमड़ रही थी. इसलिए सोचा की आज दिल खोल कर अपने मन का बोझ हल्का कर ही लूँ. आप लोगों ने अक्सर देखा होगा हिंदुस्तान के हर गाँव, हर शहर, हर कस्बे में और कुछ बेशक न मिले लेकिन एक बोर्ड जरुर मिल जायेगा जिस पर लिखा होगा कि 'यहाँ पेशाब करना मना है' . आपने यह भी देखा होगा कि जहां भी ऐसा बोर्ड नज़र आता है वहां पेशाब कि सबसे ज्यादा बदबू हो जाती है. और मेट्रो शहरों में तो पेशाब का छोटा तलब भी बन जाता है. अगर आप लोगों को विश्वास न हो तो कभी दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल से एम्स कि तरफ आयें ...सब समझ आ जायेगा. दूसरी बड़ी बात कि यहाँ पेशाब करने वालों में सिर्फ और सिर्फ पुरुष होते हैं. और उनका बहाना होता है कि क्या करें कंट्रोल नहीं होता. हालाँकि साथ में महिलाएं भी होती हैं. लेकिन न तो महिलाएं कभी रस्ते गंदे करती है और न ही शिकायत करती हैं. मेरा मसला यही है. अगर महिलाएं अह्तिआत कर सकती हैं तो पुरुष क्यों नहीं. क्या यह भी पुरुष प्रधान समाज के वर्चस्व का ही नमूना है. आखिर यूँ ही हर जगह गंदगी फैलाने से नुक्सान भी तो हमारा है, हमारे देश का है. वजह कुछ भी हो अगर महिलाएं नियंत्रण कर सकती हैं, घर से अहतियात लेकर चल सकती हैं तो पुरुष क्यों नहीं.

मामला बहुत बडा नहीं लेकिन सोचने लायक है. फिर भी अगर पुरुष मनमानी करते हैं तो क्यों निर्दोष महिलायों को सम्मानित किया जाये. और सुई कि तरह बात चुभोने के लिए इस तरह के बोर्डों में सीधे लिखा जाये कि यहाँ पुरुषों का पेशाब करना मना है.
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