चौंक गये... ?अजी बात ही कुछ ऐसी है. दरअसल बहुत दिनों से मेरे मन में एक बात उमड़ रही थी. इसलिए सोचा की आज दिल खोल कर अपने मन का बोझ हल्का कर ही लूँ. आप लोगों ने अक्सर देखा होगा हिंदुस्तान के हर गाँव, हर शहर, हर कस्बे में और कुछ बेशक न मिले लेकिन एक बोर्ड जरुर मिल जायेगा जिस पर लिखा होगा कि 'यहाँ पेशाब करना मना है' . आपने यह भी देखा होगा कि जहां भी ऐसा बोर्ड नज़र आता है वहां पेशाब कि सबसे ज्यादा बदबू हो जाती है. और मेट्रो शहरों में तो पेशाब का छोटा तलब भी बन जाता है. अगर आप लोगों को विश्वास न हो तो कभी दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल से एम्स कि तरफ आयें ...सब समझ आ जायेगा. दूसरी बड़ी बात कि यहाँ पेशाब करने वालों में सिर्फ और सिर्फ पुरुष होते हैं. और उनका बहाना होता है कि क्या करें कंट्रोल नहीं होता. हालाँकि साथ में महिलाएं भी होती हैं. लेकिन न तो महिलाएं कभी रस्ते गंदे करती है और न ही शिकायत करती हैं. मेरा मसला यही है. अगर महिलाएं अह्तिआत कर सकती हैं तो पुरुष क्यों नहीं. क्या यह भी पुरुष प्रधान समाज के वर्चस्व का ही नमूना है. आखिर यूँ ही हर जगह गंदगी फैलाने से नुक्सान भी तो हमारा है, हमारे देश का है. वजह कुछ भी हो अगर महिलाएं नियंत्रण कर सकती हैं, घर से अहतियात लेकर चल सकती हैं तो पुरुष क्यों नहीं.
मामला बहुत बडा नहीं लेकिन सोचने लायक है. फिर भी अगर पुरुष मनमानी करते हैं तो क्यों निर्दोष महिलायों को सम्मानित किया जाये. और सुई कि तरह बात चुभोने के लिए इस तरह के बोर्डों में सीधे लिखा जाये कि यहाँ पुरुषों का पेशाब करना मना है.
7 comments:
बहुत अच्छा विचार है। मैं आपकी बात से पुरी तरह सहमत हूं। हम लोग अपना शहर खुद गन्दा करते है और सरकार को गाली देते है।
इस तरह से तो कभी सोचा ही नहीं था....
Dogra ji,
Nisandeh purush samaj par tippani karne ki aapne jo kasam khayi hai..usme aap puri tarah samarpit hai..yah aapke vishyon se jahir ho raha hai....
agar aapne kabhi gaur kiya ho to Safdarjung Hospital ke pas 'Purush' w 'Mahilaon' dono keliye sauchalay gruh bane hain..ab baat yahan mahila v purush ki nahi baat laparwahi ki hai, baat aswachhwta ki hai..jise aap purushwarg samaj ke saath jod kar ek naya rup dena chahte hai..is parakar ke vishyon par likhne ki apeksha yadi aap sahar ke swakshta abhiyaan par dhayaan lagaye to kahin adhik achha hoga.
Dhanywad.
Aapka param mitr...
एक नया नजरिया..बात तो सही है.
आपने शायद ध्यान नहीं दिया
कई जगह जगह साफ साफ शब्दों में लिखा होता है
देखो गधा पेशाब कर रहा है
अब भी क्या कुछ कहना बाकी है
वैसे इसमें भला गधे की क्या गलती है
उसकी मजबूरी तो जनता समझती है
कुछ तो दम है बात में।
बेचारी नारी!! सुनील जी आप की उम्र मै हमे भी सारी नारिया बेचारी नजर आती थी
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