पुरुष शत्रु नहीं मित्र हैं!

नारी की कहानी एक प्रयत्न ताकि एक मनुष्य (पुरुष) और दूसरे मनुष्य (महिला) में मन, कर्म, वचन का कोई भेद न रहे. ताकि हर संकीर्ण सोच पर पार पाकर सच्चा समाज स्थापित हो सके, और वर्षों से नारी पर डाली गयी धर्म, रिवाजों और समाज के बेडियाँ तोड़ कर बराबरी का हक़ मिले... प्रयत्न आपकी सहभागिता के बिना अधुरा है.. आपके सहयोग की लालसा में..

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Sunday, September 14, 2008

क्यों?

अक्सर एक सवाल माँ से पुछा जाता है...
माँ क्या मुझे जीने का अधिकार नहीं?

इस सवाल के रूप अलग अलग हो सकते हैं। जैसे कि आजकल भ्रुण हत्या पर आवाज उठाने मे इस पुँछ वाक्य का प्रयोग किया जाता है, कोई बेटी अपनी मन माफिक जिन्दगी नही जी पाती है तो भी अपने माँ से यह सवाल पुछती है... और भी कई जगह हैं, जहाँ माँ के सामने इस तरह के सवाल खडे होते हैं, कई बार माँ जवाब नही दे पाती, कई बार कह देती है कि यह नियति है, कई बार इसी को जीवन मान लेने कि सलाह देती है, या कई बार मौन को परिभाषित करती है... और कुछेक को यह जीवन वाकई मे पसन्द होता है।

सामने बहुत तरह की परिस्थितीयाँ हो सकती हैं.... इस पर कुछ कहने का मन नही है...

मेरा सवाल है कि क्या किसी बेटी/बेटे ने अपने माँ के अन्दर देखने कि कोशिश की है?
क्यों कोई ये नही जानना चाहता कि उसकी माँ जी रही है कि नही? बार बार सोचती हूँ, क्या माँ सिर्फ माँ है? क्या वो इन्सान नहीं हैं? उसके अपने सपने नही होंगे? उसने अपने अरमानो का गला नही काटा कभी?
माँ सिर्फ ममता का ही रूप तो नही, वो भी इच्छाओ कि खेती करती होगी, उसने भी ख्वाब देखा होगा अपने फसल के लहलहाने का.... पर हम कभी ये जानने कि कोशिश क्यों नही करते कि, हम अपने सवाल तो उसके सामने खडे कर रहे हैं, पर कभी उसके सवालो को पढ ही नही पाये, या पढना ही नही चाहा, जानना ही नही चाहा कि माँ भी एक अस्तित्व है।

अपने अस्तित्व की तलाश मे हम इतने अंधे होते जा रहे हैं, कि अपनी जननी को ही भुल गये..... क्यों?

समझना मुश्किल है... समझाना भी मुश्किल है... किसी के पास जवाब हो तो बताये

आज बात नर नारी कि नही कर रही हूँ... प्रश्न है कि कब तक माँ को ममतामयी माँ, के रूप मे ही देखेंगे, और भूल जायेंगे कि वो इससे अलग भी एक वजुद रखती है... अगर ऐसा चलता रहा तो, बस हमारे मुट्ठी मे इन सवालो के अलावा कभी कुछ बचेगा ही नही... रहेंगे तो सिर्फ अनसुलझे सवाल और अस्तित्व हीन शरीर.... :।
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