पुरुष शत्रु नहीं मित्र हैं!

नारी की कहानी एक प्रयत्न ताकि एक मनुष्य (पुरुष) और दूसरे मनुष्य (महिला) में मन, कर्म, वचन का कोई भेद न रहे. ताकि हर संकीर्ण सोच पर पार पाकर सच्चा समाज स्थापित हो सके, और वर्षों से नारी पर डाली गयी धर्म, रिवाजों और समाज के बेडियाँ तोड़ कर बराबरी का हक़ मिले... प्रयत्न आपकी सहभागिता के बिना अधुरा है.. आपके सहयोग की लालसा में..

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Monday, July 21, 2008

नारी की कहानी, नारी की जुबानी

लिखना है नारी की कहानी पर, और यह मेरी सबसे बडी परेशानी है कि कैसे लिखूँ, एक तो संशय है कि इस ब्लॉग पर यह मेरा पहला पोस्ट है, जाने क्या प्रतिक्रियायें आयेंगी, अरसा बीता गया इस तरह के मुद्दो पर लिखते हूए, और मैने पाया है कि जब भी किसी मुद्दे पर लिखा बोला जाता है तो जैसे सभी लोगो को हंगामा करने के लिये एक अच्छा विषय मिल जाता है, विषय भी ऐसा कि लोग चटखारे ले ले पढते हैं, सार्थक बहस तो होती नही, ऊपर से कई और तोहमत लगा दिया जाता है, बात मुद्दे से हटकर, व्यक्तिगत बन जाती है, लेखक या तो चुप हो जाये या फिर माँगी ना मान ले तब तक विचार-विमर्श बहस होता ही रहता है, बहस ऐसा कि आप या तो रो पडेंगे या फ़िर क्रोध से मर जायेंगे।
वास्तव मे मुझे डर इस बात का नही लग रहा है कि कितना विचार-विमर्श बहस होगा, डर इस बात का है कि इस बहाने कितनी ही औरतो का दर्द कुरेदा जायेगा, और उस पर कितने पूरूष अपने हाथ सेकेंगे और ये कहते दिखेंगे कि जाने ये औरते हर गम की जिम्मेदार पूरूषो को ही क्यों मानती हैं, ऐसा सोचते हूए घर तक जायेंगे और कहेंगे सुनती हो, आज ब्लॉग पर एक ब्लॉगर को खुब लपेटा, असहज सी अगडम-बगडम बाते बोलती है, और फिर अपनी भडास वहाँ भी निकालेंगे, युवक अपने दिल की भडास दुसरे दोस्तो से बाँटकर और लेखक के प्रति कुछ अपशब्द बोलकर निकालेंगे, बात इतनी बलवती होगी कि अब महिलायें भी अपना भडास निकालने से पीछे नही हटेंगी वो भी कही ना कही सुविचार विचार देते हूए मिल जायेंगी, अर्रे समाज की व्यवहारिकता को समझना ही पडता है, जो नही समझ सकता उसे इस तरह के तानो का शिकार तो होना ही पडेगा, फ़िर अब ये कहानी किसलिये लिखा जाये, जब अन्त मुझे अभी से दिख रहा है।
ऐसा नही कि नारी कहानी लिखने पर सिर्फ़ तर्क ही दिखेंगे, आपका साथ देते हूए साथ भी आयेंगे पर वो भी सार्थक चर्चा के लिये आये ऐसा नही है, कुछेक वाह-वाह बहुत अच्छा मुद्दा उठाया है, ऐसा बोलके निकल जायेंगे तो कुछ लोग कहेंगे आप घबडाईये मत, हम आपके साथ है।
इनमे बहूत कम लोग ऐसे होंगे जो वास्तव मे विषय की गम्भीरता को समझ पायेंगे।

Tuesday, July 15, 2008

नारीवाद खतरनाक तो नहीं?

ब्लॉग की दुनिया तो महज़ एक उदाहरण है, आजकल इस संसार में और खासकर भारत में नारीवाद में तेजी से वृद्धि दिखाई दे रही है. महिलाओं को सशक्त होता देखना सचमुच रोमांचक और ख़ुशी देने वाला है. आखिर हम भारतवासी तो सदियों से महिलाओं की बराबरी की बात करते हैं.. 'अर्धांगिनी' शब्द या सिद्धांत शायद इसी बात को पुष्ट और परिभाषित भी करता है... परन्तु साथ ही महिलाओं को पहले अघोषित फिर घोषित तौर पर पुरुषों से कम योग्य बता दिया. कमोबेश स्तिथि यहाँ तक अ गयी की पुरुष महिलायों के लिए स्वामी बन गये..तथा महिलाओं उनके लिए कुछ कारणों मात्र का साधन.. भले ही पुरुष औरर महिलाएं एक दूसरे के पूरक हों तथा प्रभु ने दोनों को अलग कारणों से बनाया हो..परन्तु मनुष्य मात्र में यह खाई बड़ती गयी.. और आज हम देख सकते हैं की पशुओं में मादाओं का भी समान महत्व है और कुछ विशेष स्थानों पर नर से भी ज्यादा.....

लेकिन आप कब तक किसी को दवा सकते हैं, आखिर लावा फूट पडा और महिलाएं एकजुट व सशक्त हो कर उबार रही है.. हर कम में पुरुषों की न सिर्फ बराबरी का रही हैं बल्कि उनसे श्रेष्ठ भी साबित हो रही हैं.. शायद अब पुरुषों को भी वस्तुस्थिति का आभास हो चूका है.. ऐसे में दुखद बात यह है कि महिलाएं अब न्याय की लडाई अन्याय के विरुद्ध न लड़कर पुरुषों के खिलाफ अपनाती जा रही हैं.. कहीं यह कह्तार्नक साबित न हो ..समूचे मानव इतिहास के लिए.. बराबरी की दुनिया में क्या वर्चस्व को जगह मिल सकती है...

प्रश्न कायम है.. उत्तर की प्रतीक्षा है...

Friday, July 11, 2008

पुरुष नसबन्धी मतलब मर्दों के नाम पर कलंक

मेरे एक सहयोगी अख़बार पढ़ रहे थे. अख़बार का पेज पलटते ही एक खबर पर नज़र गयी. पुरुष नसबन्धी से अभी भी डरते हैं लोग. मेरे सहयोगी ने कहा, मर्द जात पर कलंक हैं ऐसे लोग.. जो नसबन्धी करवा लेते हैं..
बहुत साल पहले जब मैं बहुत छोटा था.. शायद सातवीं मैं पड़ता था.. हमारे पडौस में एक व्यक्ति ने नसबन्धी करवाई थी. उस के अगले दिन वो काम पर नही गया. हालाँकि में बहुत छोटा था लेकिन मैंने पाया कि हर कोई उसकी आलोचना कर रहा था, हर कोई कह रहा था कि देखो उसकी औरत कितनी मोटी है लेकिन उसने अपना 'आपरेशन' करवा लिया.. अब पता चलेगा जब बीमार पड़ेगा पहले ही उसकी हालत ठीक नहीं है.. औरतों को इतना चडाना ठीक नहीं. ऐसा कहने वालों में अधिकतर महिलाएं ही थी.हालाँकि तब में 'आपरेशन' का मतलब नहीं जानता था लेकिन अब अच्छी तरह से जानता हूँ.. इतने सालों बाद भी पढे लिखे लोगों कि मानसिकता में कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ..

एक डाक्टर मित्र से बात करने पर मैंने जाना कि महिलाओं को'आपरेशन' के बाद कई बीमारियाँ घेर लेती हैं साथ ही उन्हें तकलीफदेह आपरेशन का सामना भी करना पड़ता है. जबकि पुरुषों के साथ ऐसा नहीं है उनके साथ ऐसा नहीं होता. उनका आपरेशन जल्दी और बिना तकलीफ के हो जाता है..जबकि महिलाओं को लम्बे समय तक इसके परिणाम भुगतने पड़ते हैं..

महिलाओं को बराबरी तो घर से ही देनी होगी न... हर काम को साझा कर के.. सुख-दुःख दोनों को साथ ही निभाने होंगे..
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