पुरुष शत्रु नहीं मित्र हैं!

नारी की कहानी एक प्रयत्न ताकि एक मनुष्य (पुरुष) और दूसरे मनुष्य (महिला) में मन, कर्म, वचन का कोई भेद न रहे. ताकि हर संकीर्ण सोच पर पार पाकर सच्चा समाज स्थापित हो सके, और वर्षों से नारी पर डाली गयी धर्म, रिवाजों और समाज के बेडियाँ तोड़ कर बराबरी का हक़ मिले... प्रयत्न आपकी सहभागिता के बिना अधुरा है.. आपके सहयोग की लालसा में..

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Friday, June 27, 2008

कुछ 'काम' सिर्फ महिलाओं के लिए होते हैं...

कुछ दिन पहले की बात है. मैं हरियाणा के एक गाँव में गया. दिल्ली से कुछ ही दूर. में वहन अपने एक दोस्त के साथ गया था क्योंकि वहाँ एक फक्ट्री बंद हो जाने के कारण बहुत से लोग बेरोजगार हो गये थे. चूँकि मैं पत्रकारिता इ जुदा हूँ इसलिए वहाँ के लोगों का दर्द उजागर करना मेरा फ़र्ज़ था. वहाँ जाकर मैंने देखा कि बेरोजगार हो चुके मर्द हुक्के और ताश कि महफिल जमा कर अपना धुखडा रोते थे. और उनकी पत्नियाँ सारा काम करती थी. हमने गौर किया कि महिंलाओं कि जिंदगी सूरज निकले से पहले शुरू हो जाती है. घर में झाडू-पोचा करके लकडी काट कर चूल्हा जलती हैं. पुरे घर के लिए खाना बनाकर, उन्हें खिला कर फिर उन्हें खाना नसीब हिओता है. उसके बाद पशुओं के लिए घास काटने का काम, साथ ही पानी भरना और न जाने कितने काम.. सब लिखने बैठूँगा तो न जाने कितने पेज भर जाएँ..

जबकि सारा दिन मर्द खाते पीते और पडे रहते शाम को उनकी महफिलें शुरू हो जाती... हमने उसे पुछा कि आप क्यों अपनी पत्नियों कि मदद करते हैं.. तो अधिकतर का कहना था कि कुछ काम सिर्फ महिलाओं के लिए होते हैं.. और चाहे हम दिन भर बेकार बैठे रहें महिलाओं के काम तो महिलाऐं ही करेंगी..

काश! यह एक गाँव कि कहानी होती. अफ़सोस पुरे हिंदुस्तान कि यही कहानी है. हाँ, पड़े लिखे परिवारों में यह बात जरूर काम है. मेरे अपने घर में मैंने पिता जी को खाना बनाते, कपडे धोते, पानी भरते देखा है. लेकिन अभी भी ऐसे घर हमारे पहाडों में हैं जहाँ महिलाओं को ऊँचे पेड़ों पर से लकडी काट कर लानी होती है.. और सब काम करने होते हैं..और मर्द रोटियां फाड़ते हैं..
शिक्षा कि व्यार पहुँचने के साथ फर्क आता है लेकिन यह धरना ख़त्म नहीं होती कि कुछ काम सिर्फ महिलाओं के लिए होते हैं.. इसकी झलक उन परिवारों में मिलती है जहाँ पति पत्नी दोनों काम करते हैं..
हमारे कार्यालय में काम करने वाली ऐसे महिलाएं अक्सर बताई हा कि उन्हें घर जाकर सब काम करने पड़ते हैं क्योंकि नोकरों पर १००% निर्भर नहीं रहा जा सकता...

सार्थक संवाद कि आशा से आपके सामने यह बात रख रहा हूँ,.

Sunday, June 22, 2008

....एक लड़के ने अचानक अपने हाथ से उसका स्तन मसल दिया. मैं स्तब्ध रह गया..

कुछ समय पहले की बात है. मैं पार्क में आराम फरमा रहा था. सामने कुछ दूरी पर एक लड़की टहल रही थी. शाम का वक्त था फिर भी पार्क लगभग खाली था. कारण शायद मानसून होगा. उस समय भी आसमान में बदल थे. रह रह कर बूंदाबांदी हो रही थी. में एक तक उस लड़की के हुस्न को निहार रहा था. हालाँकि वो अपने में मस्त थी. उसे मेरे होने का अंदाजा भी शायद नहीं था. इतने में युवकों का एक दल उसके पास से गुजरा. शायद तीन थे. आवारा टाइप. जैसे ही टोली लड़की के पास पहुंची. एक लड़के ने अचानक अपने हाथ से उसका स्तन मसल दिया. मैं स्तब्ध रह गया..

पलक झपकते ही युवकों की टोली गायब हो गयी. लड़की के चेहरे का सारा नूर उड़ गया. हालाँकि मैं दूर था लेकिन उसके माथे का पसीना और आँखों के आंसू मुझे साफ़ दिखाई दे रहे थे. मोसम ठंडा था. लड़की उसी समय वहन से चली गयी.

मैं अपराध बोध से घिर रहा हूँ. यह कैसा समाज है. और ऐसा भी नहीं है की यह घटना अप्रत्याशित हो... लड़की होना क्या गुनाह है. और ऐसी घटनाओं का जवाब क्या हो. मैं नही जानता.. आपको पता हो तो जरूर बताएं....

Monday, June 2, 2008

मुसीबत का दूसरा नाम लड़की!

यूरोप के एक बडे देश के एक निसंतान दंपत्ति ने कृत्रिमगर्भधारण के जरिये संतान सुख पाने के लिए दिल्ली का रुख किया. टेस्ट ट्यूब तकनीक के जरिये उनकी मनोकामना पूरी भी हो गयी लेकिन जब बच्चे का जन्म हुआ तो वह 'बेटी' थी, विदेशी दंपत्ति वापस चला गया और अस्पताल में छोड़ गया उस बिलखती बच्ची को.....

सिर्फ इसलिए क्योंकि वह लड़की थी, मैं आज तक यह समझ नहीं पाया हूँ की लड़की में ऐसी क्या मनहूसियत होती है जो सदा से ही वो नकारी जाती है. लेकिन जरा गौर कीजिए, उक्त दंपत्ति में भी तो एक लड़की थी, जिसने मां कि भूमिका निभाई थी.. ऐसे में तो एक ही कारण हो सकता है कि उस मां ने यह सोच कर नवजात लड़की को नहीं अपनाया होगा कि उसकी हालत ठीक नहीं है अर्थात वो महिला खुद दुनिया से हार मान कर अपनी बच्ची को नहीं अपनाना चाहती क्योंकि शायद उसने समाज को औरत के साथ अच्छा बर्ताब करते नहीं देखा और घुटने टेक दिए...

ऐसे में तो साफ है कि महिला कि कमजोरी के पीछे भी महिला है. अगर समाज चलाने के लिए, जीवन के लिए महिला और पुरुषों का बराबर होना जरूरी है तो क्यों महिला खुद को पीछे पाकर खामोश रहती है.. खासकर अब, जब यह समाज पुरुष प्रधान होने का लेबल उतरने को तैयार है..
अब तो वो जमाने भी गए जब महिलाओं को सिर्फ चारदीवारी के अंदर रहना होता था... जहाँ तक मैं समझता हूँ, जो महिला प्रयत्न करती है आगे बढती है और यह बात सब पर लागू है. समाज भी हमसे ही बनता है ना

अगर उस माँ ने अपनी बेटी को अपनाने का हाथ किया होता तो शायद एक नन्ही जान को बोझ नहीं कहलाना पड़ता.. ..
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