पुरुष शत्रु नहीं मित्र हैं!
Friday, June 27, 2008
कुछ 'काम' सिर्फ महिलाओं के लिए होते हैं...
जबकि सारा दिन मर्द खाते पीते और पडे रहते शाम को उनकी महफिलें शुरू हो जाती... हमने उसे पुछा कि आप क्यों अपनी पत्नियों कि मदद करते हैं.. तो अधिकतर का कहना था कि कुछ काम सिर्फ महिलाओं के लिए होते हैं.. और चाहे हम दिन भर बेकार बैठे रहें महिलाओं के काम तो महिलाऐं ही करेंगी..
काश! यह एक गाँव कि कहानी होती. अफ़सोस पुरे हिंदुस्तान कि यही कहानी है. हाँ, पड़े लिखे परिवारों में यह बात जरूर काम है. मेरे अपने घर में मैंने पिता जी को खाना बनाते, कपडे धोते, पानी भरते देखा है. लेकिन अभी भी ऐसे घर हमारे पहाडों में हैं जहाँ महिलाओं को ऊँचे पेड़ों पर से लकडी काट कर लानी होती है.. और सब काम करने होते हैं..और मर्द रोटियां फाड़ते हैं..
शिक्षा कि व्यार पहुँचने के साथ फर्क आता है लेकिन यह धरना ख़त्म नहीं होती कि कुछ काम सिर्फ महिलाओं के लिए होते हैं.. इसकी झलक उन परिवारों में मिलती है जहाँ पति पत्नी दोनों काम करते हैं..
हमारे कार्यालय में काम करने वाली ऐसे महिलाएं अक्सर बताई हा कि उन्हें घर जाकर सब काम करने पड़ते हैं क्योंकि नोकरों पर १००% निर्भर नहीं रहा जा सकता...
सार्थक संवाद कि आशा से आपके सामने यह बात रख रहा हूँ,.
Sunday, June 22, 2008
....एक लड़के ने अचानक अपने हाथ से उसका स्तन मसल दिया. मैं स्तब्ध रह गया..
कुछ समय पहले की बात है. मैं पार्क में आराम फरमा रहा था. सामने कुछ दूरी पर एक लड़की टहल रही थी. शाम का वक्त था फिर भी पार्क लगभग खाली था. कारण शायद मानसून होगा. उस समय भी आसमान में बदल थे. रह रह कर बूंदाबांदी हो रही थी. में एक तक उस लड़की के हुस्न को निहार रहा था. हालाँकि वो अपने में मस्त थी. उसे मेरे होने का अंदाजा भी शायद नहीं था. इतने में युवकों का एक दल उसके पास से गुजरा. शायद तीन थे. आवारा टाइप. जैसे ही टोली लड़की के पास पहुंची. एक लड़के ने अचानक अपने हाथ से उसका स्तन मसल दिया. मैं स्तब्ध रह गया..
पलक झपकते ही युवकों की टोली गायब हो गयी. लड़की के चेहरे का सारा नूर उड़ गया. हालाँकि मैं दूर था लेकिन उसके माथे का पसीना और आँखों के आंसू मुझे साफ़ दिखाई दे रहे थे. मोसम ठंडा था. लड़की उसी समय वहन से चली गयी.
मैं अपराध बोध से घिर रहा हूँ. यह कैसा समाज है. और ऐसा भी नहीं है की यह घटना अप्रत्याशित हो... लड़की होना क्या गुनाह है. और ऐसी घटनाओं का जवाब क्या हो. मैं नही जानता.. आपको पता हो तो जरूर बताएं....
Monday, June 2, 2008
मुसीबत का दूसरा नाम लड़की!
सिर्फ इसलिए क्योंकि वह लड़की थी, मैं आज तक यह समझ नहीं पाया हूँ की लड़की में ऐसी क्या मनहूसियत होती है जो सदा से ही वो नकारी जाती है. लेकिन जरा गौर कीजिए, उक्त दंपत्ति में भी तो एक लड़की थी, जिसने मां कि भूमिका निभाई थी.. ऐसे में तो एक ही कारण हो सकता है कि उस मां ने यह सोच कर नवजात लड़की को नहीं अपनाया होगा कि उसकी हालत ठीक नहीं है अर्थात वो महिला खुद दुनिया से हार मान कर अपनी बच्ची को नहीं अपनाना चाहती क्योंकि शायद उसने समाज को औरत के साथ अच्छा बर्ताब करते नहीं देखा और घुटने टेक दिए...
ऐसे में तो साफ है कि महिला कि कमजोरी के पीछे भी महिला है. अगर समाज चलाने के लिए, जीवन के लिए महिला और पुरुषों का बराबर होना जरूरी है तो क्यों महिला खुद को पीछे पाकर खामोश रहती है.. खासकर अब, जब यह समाज पुरुष प्रधान होने का लेबल उतरने को तैयार है..
अब तो वो जमाने भी गए जब महिलाओं को सिर्फ चारदीवारी के अंदर रहना होता था... जहाँ तक मैं समझता हूँ, जो महिला प्रयत्न करती है आगे बढती है और यह बात सब पर लागू है. समाज भी हमसे ही बनता है ना
अगर उस माँ ने अपनी बेटी को अपनाने का हाथ किया होता तो शायद एक नन्ही जान को बोझ नहीं कहलाना पड़ता.. ..