पुरुष शत्रु नहीं मित्र हैं!

नारी की कहानी एक प्रयत्न ताकि एक मनुष्य (पुरुष) और दूसरे मनुष्य (महिला) में मन, कर्म, वचन का कोई भेद न रहे. ताकि हर संकीर्ण सोच पर पार पाकर सच्चा समाज स्थापित हो सके, और वर्षों से नारी पर डाली गयी धर्म, रिवाजों और समाज के बेडियाँ तोड़ कर बराबरी का हक़ मिले... प्रयत्न आपकी सहभागिता के बिना अधुरा है.. आपके सहयोग की लालसा में..

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Monday, May 26, 2008

सफेद कपडों में लिपटी गंजी विधवा का क्या दोष है...

तीन-चार साल पहले की बात है तब मैं 11वीं में पड़ता था, उन्ही दिनों हमारा हरिद्वार घूमने जाने का कार्यक्रम बना, गंगा तट पर हम लोग मौज कर रहे थे.. तभी हमने देखा की वहाँ एक बूढी औरत बात कटवा रही थी, साथ में कुछ और लोग थे.. बात करने पर पता चला की 65 साल की यह औरत राजस्थान की है और इसके पति की मौत हो गयी है.. कुछ ही देर में उस औरत के सिर से सफेद परत जमीन पर गिर चुकी थी.. नाई उस्तरे की धार तेज कर रहा था और वह निष्प्राण शरीर की तरह बैठी हुई थी. साथ में आये लोगों ने बताया की की अब उम्र भर यह औरत बिना बालों के रहेगी... पिछली पोस्ट में मैंने महिला के श्रृंगार की बात की थी, तब एक पाठिका ने मुझे इस घटना का बोध कराया..दिल्ली आने के बाद मैंने देखा की आस-पडोस में खासकर उत्तर प्रदेश की विधवा महिलाएं केवल सफेद कपडे पहनती हैं.. हमारे यहाँ हिमाचल में मैंने विधवा औरतों को हलके रंग के कपडे पहनते देखा है और उन्हें किसी भी तरह से अपवित्र नहीं समझा जाता है जबकि तथाकथित cow-belt में इससे उल्टा है.. जहाँ तक मैं समझता हूँ इस अंतर का कारण शिक्षा है.. क्योंकि शिक्षित होने के साथ समाज पुरानी दकियानूसी को ख़त्म कर देता है.. भला इसमें विधवा का क्या दोष की उसका पति मर गया. समस्या है की समाज जीने नहीं देता.. दया आप समाज से विद्रोह करने का साहस जुटा सकते हैं.. मैं आपके साथ हूँ..

Tuesday, May 20, 2008

शादीशुदा पुरुष और विवाहित महिला ...सवाल निशानी का!

एक और बहस हो रही थी. वही घिसा-पिटा सवाल पूछा जा रहा था कि शादीशुदा महिलाएं बिंदिया लगती हैं, मांग में सिन्दूर सजाती हैं, मंगलसूत्र पहनती हैं, कुल मिला कर उन्हें आसानी से पहचान कर पता लगाया जा सकता है वह शादीशुदा हैं या नहीं. लेकिन मर्दों को पहचानना मुश्किल है, किसी भी पुरुष को देख कर आप पता नहीं लगा सकते कि वह शादीशुदा है या नहीं.... कुछ तथाकथित आधुनिक लोग सलाह देते हैं कि शादीशुदा मर्द ऐसा करें, वैसा करें...आदि. एक सुझाव जो अक्सर दिया जाता है वो यह कि शादीशुदा मर्द पांव में लोहे का कड़ा पहने.. कितना हास्यस्पद है.


पहली बात, मंगल सूत्र, सिन्दूर, बिंदिया आदि को इसलिए नहीं धारण किया जाता कि पता लगाया जा सके कि महिला विशेष विवाहित है या नहीं... अतः यह धारणा कि पुरुषों या महिलाओं को विवाहित होने कोई चिन्ह हमेशा अपने साथ टांग कर रखना चाहिए ...सरासर गलत है.


अब प्रश्न उठता है कि अगर उपयुर्क्त चीज़ें विवाहित महिला कि निशानी नहीं हैं तो इन्हें केवल शादीशुदा महिलाएं ही क्यों धारण करती हैं.. जहाँ तक मैं समझता हूँ तो यह चीज़ें महिला का श्रृंगार हैं, जिनसे महिलाओं कि सुन्दरता मैं चार चाँद लगते हैं.. चूंकि महिला को सुन्दर का अधिकार हैं अतः उसे इन सब चीजों को धारण करने का भी अधिकार है.. हमने तो यहाँ तक पढ़ा है कि पाषंड युग में महिलाएं हड्डियों से बने आभूषण पहनती थी.. अतः आभूषण इत्यादी महिला के सौन्दर्य को निखारने के लिए हैं ना कि किसी और वजह के लिए..

दुर्भाग्य से महिला सशक्तिकरण की बात करने वाले पुरुषों पर हर तरह के हमले करते हैं..और भूल जाते हैं कि पुरुष शत्रु नहीं मित्र हैं..
हाँ, यह सब चिन्ह कुछ ही धर्मों द्वारा इस्तेमाल किये जाते हैं, वैसे भी अगर किसी महिला को यह सब चीज़ें बोझ लगती हैं तो उसे इनका त्याग करना चाहिए..

Friday, May 16, 2008

एक और बलात्कार! जम के फैशन करो..

टीवी पर चर्चा हो रही थी. एक लड़की का बलात्कार हो गया था. एक महोदय बोले लड़कियों को कम फैशन करना चाहिए...

लेकिन क्यों.....
कई प्रशन उठते हैं.. सबसे पहला की क्या कम फैशन करने से ऐसे अपराध नहीं होंगे ?इससे भी खतरनाक प्रशन यह है कि ऐसे अपराध करने वाले लोग भेडिये हैं... जो लड़कियों को देखते ही आप खो देते हैं.. अगर सचमुच ऐसा है तो पर्दा करने कि जरूरत किसे है.. ऐसे संदिग्ध लोगों की आखों पर पट्टियाँ बांध देनी चाहिए.. पर्दे की जरूरत उन लोगों को है न की मासूम लड़कियों को..
दूसरी बात क्या सचमुच फैसहं ही जिम्मेदार है ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के लिए. तो क्या कारण है की दूध पीती बच्चियों के बलात्कार हो जाते हैं.. क्यों मानसिक रूप से विक्षिप्त लड़कियों पर कहर टूटता है..
यह कैसी सोच है की फैशन पर रोक लगा दो... रोक तो उन लोगों पर लगनी चाहिए जो ऐसे भयानक बयान देते हैं.. सोच बदलनी होगी ऐसी लोगों की.. अगर नहीं तो ऐसी सोच रखने वालों को ही बदल देना होगा..


फैशन पतित नहीं पवित्र है

Tuesday, May 13, 2008

नारी या आफत की बीमारी...

दो चार दिन पहले की बात है. मैं बस से कहीं जा रहा था. दिल्ली की बसों में बहुत भीड़ होती है. उस दिन भी बहुत ज्यादा भीड़ थी. लेकिन मुद्दा कुछ और है..

मैं सीट पर बैठा हुआ था.. तभी एक लड़की मेरे बगल मैं आ खड़ी हुई. चूंकि मैं नॉन-लेडीज सीट पर बैठा था इसलिए मैंने उसे सीट देना जरूरी नहीं समझा. साथ में एक सरदार जी भी खडे थे. उनकी उम्र पैंतालिस से कम न थी. कुछ देर बाद मैंने ध्यान दिया की लड़की सहज नहीं थी. शायद कुछ प्रेषण थी. बार बार सरदार जी की तरफ घूर घूर कर देख रही थी. लेकिन सरदार जी ध्यान नहीं दे रहे थे. पहले तो मैंने सोचा की शायद गर्मी की वजह से परेशान होगी. मेरा फ़र्ज़ था की में उसे सीट दे दूं लेकिन मैंने नहीं दी. कुछ देर बाद मैंने पाया की सरदार जी लड़की से छेड-छाड कर रहे हैं. वो बार बार लड़की की तरफ झुक रहे थे.. उसे छोने का प्रयास कर रहे थे.. शर्म और गुस्से के कारण मेरी आँखे लाल हो गयी... लेकिन में तो तब कुछ करता अगर लड़की सरदार जी पर आपत्ति जताती.. खैर लड़की को सीट देकर मैंने तो अपनी गलती सुधार ली. लेकिन एक बात सामने आ गयी की नौजवान ही नहीं अधेड़ लोग भी ऐसी हरकतें करते हैं..

बाद में मैंने घटना का जिक्र एकमहोदय से किया तो उन्होने कहा कि लड़कियों को सभी कपडे पहनने चाहिए. लेकिन मैं सोचता हूँ कि ऐसे मर्द क्या भूखे भेडियें हैं जो अपने ऊपर सभ्यता को दमन नहीं रख सकते..


महिला क्यों चुप है... लेकिन भला वो बोले क्या और किससे...
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