पुरुष शत्रु नहीं मित्र हैं!
Monday, May 26, 2008
सफेद कपडों में लिपटी गंजी विधवा का क्या दोष है...
Tuesday, May 20, 2008
शादीशुदा पुरुष और विवाहित महिला ...सवाल निशानी का!
पहली बात, मंगल सूत्र, सिन्दूर, बिंदिया आदि को इसलिए नहीं धारण किया जाता कि पता लगाया जा सके कि महिला विशेष विवाहित है या नहीं... अतः यह धारणा कि पुरुषों या महिलाओं को विवाहित होने कोई चिन्ह हमेशा अपने साथ टांग कर रखना चाहिए ...सरासर गलत है.
अब प्रश्न उठता है कि अगर उपयुर्क्त चीज़ें विवाहित महिला कि निशानी नहीं हैं तो इन्हें केवल शादीशुदा महिलाएं ही क्यों धारण करती हैं.. जहाँ तक मैं समझता हूँ तो यह चीज़ें महिला का श्रृंगार हैं, जिनसे महिलाओं कि सुन्दरता मैं चार चाँद लगते हैं.. चूंकि महिला को सुन्दर का अधिकार हैं अतः उसे इन सब चीजों को धारण करने का भी अधिकार है.. हमने तो यहाँ तक पढ़ा है कि पाषंड युग में महिलाएं हड्डियों से बने आभूषण पहनती थी.. अतः आभूषण इत्यादी महिला के सौन्दर्य को निखारने के लिए हैं ना कि किसी और वजह के लिए..
दुर्भाग्य से महिला सशक्तिकरण की बात करने वाले पुरुषों पर हर तरह के हमले करते हैं..और भूल जाते हैं कि पुरुष शत्रु नहीं मित्र हैं..
हाँ, यह सब चिन्ह कुछ ही धर्मों द्वारा इस्तेमाल किये जाते हैं, वैसे भी अगर किसी महिला को यह सब चीज़ें बोझ लगती हैं तो उसे इनका त्याग करना चाहिए..
Friday, May 16, 2008
एक और बलात्कार! जम के फैशन करो..
टीवी पर चर्चा हो रही थी. एक लड़की का बलात्कार हो गया था. एक महोदय बोले लड़कियों को कम फैशन करना चाहिए...
लेकिन क्यों.....
कई प्रशन उठते हैं.. सबसे पहला की क्या कम फैशन करने से ऐसे अपराध नहीं होंगे ?इससे भी खतरनाक प्रशन यह है कि ऐसे अपराध करने वाले लोग भेडिये हैं... जो लड़कियों को देखते ही आप खो देते हैं.. अगर सचमुच ऐसा है तो पर्दा करने कि जरूरत किसे है.. ऐसे संदिग्ध लोगों की आखों पर पट्टियाँ बांध देनी चाहिए.. पर्दे की जरूरत उन लोगों को है न की मासूम लड़कियों को..
दूसरी बात क्या सचमुच फैसहं ही जिम्मेदार है ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के लिए. तो क्या कारण है की दूध पीती बच्चियों के बलात्कार हो जाते हैं.. क्यों मानसिक रूप से विक्षिप्त लड़कियों पर कहर टूटता है..
यह कैसी सोच है की फैशन पर रोक लगा दो... रोक तो उन लोगों पर लगनी चाहिए जो ऐसे भयानक बयान देते हैं.. सोच बदलनी होगी ऐसी लोगों की.. अगर नहीं तो ऐसी सोच रखने वालों को ही बदल देना होगा..
फैशन पतित नहीं पवित्र है
Tuesday, May 13, 2008
नारी या आफत की बीमारी...
मैं सीट पर बैठा हुआ था.. तभी एक लड़की मेरे बगल मैं आ खड़ी हुई. चूंकि मैं नॉन-लेडीज सीट पर बैठा था इसलिए मैंने उसे सीट देना जरूरी नहीं समझा. साथ में एक सरदार जी भी खडे थे. उनकी उम्र पैंतालिस से कम न थी. कुछ देर बाद मैंने ध्यान दिया की लड़की सहज नहीं थी. शायद कुछ प्रेषण थी. बार बार सरदार जी की तरफ घूर घूर कर देख रही थी. लेकिन सरदार जी ध्यान नहीं दे रहे थे. पहले तो मैंने सोचा की शायद गर्मी की वजह से परेशान होगी. मेरा फ़र्ज़ था की में उसे सीट दे दूं लेकिन मैंने नहीं दी. कुछ देर बाद मैंने पाया की सरदार जी लड़की से छेड-छाड कर रहे हैं. वो बार बार लड़की की तरफ झुक रहे थे.. उसे छोने का प्रयास कर रहे थे.. शर्म और गुस्से के कारण मेरी आँखे लाल हो गयी... लेकिन में तो तब कुछ करता अगर लड़की सरदार जी पर आपत्ति जताती.. खैर लड़की को सीट देकर मैंने तो अपनी गलती सुधार ली. लेकिन एक बात सामने आ गयी की नौजवान ही नहीं अधेड़ लोग भी ऐसी हरकतें करते हैं..
बाद में मैंने घटना का जिक्र एकमहोदय से किया तो उन्होने कहा कि लड़कियों को सभी कपडे पहनने चाहिए. लेकिन मैं सोचता हूँ कि ऐसे मर्द क्या भूखे भेडियें हैं जो अपने ऊपर सभ्यता को दमन नहीं रख सकते..
महिला क्यों चुप है... लेकिन भला वो बोले क्या और किससे...