पुरुष शत्रु नहीं मित्र हैं!

नारी की कहानी एक प्रयत्न ताकि एक मनुष्य (पुरुष) और दूसरे मनुष्य (महिला) में मन, कर्म, वचन का कोई भेद न रहे. ताकि हर संकीर्ण सोच पर पार पाकर सच्चा समाज स्थापित हो सके, और वर्षों से नारी पर डाली गयी धर्म, रिवाजों और समाज के बेडियाँ तोड़ कर बराबरी का हक़ मिले... प्रयत्न आपकी सहभागिता के बिना अधुरा है.. आपके सहयोग की लालसा में..

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Sunday, August 10, 2008

हुस्न की तारीफ़ भी गुनाह तो नहीं!!!

अपनी तारीफ सभी को अच्छी लगती है. खासकर अपने रंग रूप और नैन नक्शों की तारीफ. और फिर महिलायों के हुस्न की तारीफ करना तो सबसे अच्छा काम समझा जाता है. और इसमें भी कोई शक नहीं कि खुद महिलाएं भी अपने हुस्न कि तारीफ सुनना पसंद करती हैं. लेकिन सचमुच स्थिति इतनी सुन्दर नहीं है और शयद कभी नहीं थी.

कुछ समय पहले मैंने एक लेख लिखा था, इसी ब्लॉग पर हालाँकि वह विषय अलग था. और मैंने उस लेख में एक पंक्ति लिख दी थी कि 'मैं उसके हुस्न को निहार रहा था' इसमें कुछ भी गलत नहीं था.. और फिर हमारा साहित्य और खासकर कवितायेँ, गीत, शेर और गज़लें आदि सब हुस्न कि तारीफ और शोखियों कि मदहोशियों पर लिखी गयी हैं. फिर लेख में हुस्न की तारीफ कैसे गलत हो सकती है. लेख में ही क्यों कहीं भी गलत नहीं हो सकती. चूँकि में यह ब्लॉग महिला सशक्तिकरण के समर्थन में शुरू किया था और मैं नारी और पुरुष की समानता का पक्षधर हूँ. और रहूँगा.

जहाँ तक मेरा विचार है इस मसले पर संकीर्ण राय के पीछे कारण क्या है तो मैं समझता हूँ की पुरुष और महिलाएं दोनों इसलिए इस मसले पर बचते फिरते हैं क्योंकि उन्हें एक अपराधबोध सताता रहता है जो निराधार है. सच कहूँ तो वे कुछ ज्यादा ही निष्पक्ष या नैतिक होने का प्रयत्न करते हैं. उदाहरण के तौर पर मैं बताना चाहता हूँ की अधिक वर्षा खतरनाक है लेकिन बारिश न होना भी ठीक नहीं है. नैतिक होना जरूरी है परन्तु कुछ ऐसा बन जाना जो नैतिकता की सीमा मैं भी न आये उस बात का फायदा. और फिर यथार्थ में जीना चाहिए.

अगर मैं कहूँ कि प्रैक्टिकल हो कर रहा जाये तो अच्छा है सबके किए. और फिर अगर जीवन को जीवन की तरह जिया जाए तो बेहतर है.
हो सकता है कि मी विचारों से आप सहमत न हों या हों भी. पर मैंने बहस छेड़ दी है आपसे आशा है कि आप बहस को मुकाम तक पहुंचाएंगे.

4 comments:

Anonymous said...

you are leading yourself on very wrong path on the name of such things... like woman empowerment and husn etc.

रंजन said...

सुनील जी, आपने बहुत अच्छी शरुआत की है. हुस्न की तारीफ जरूरी है. और हर उस चीज़ की तारीफ जरूरी है जो तारीफ के काबिल है

Mahak said...

एक महिला होने के नाते में कह सकती हूँ की 'हुस्न' की तारीफ होनी ही चाहिए..

Neeraj Rohilla said...

कोशिश करके देखिये वैसे तो "हुस्न-ए-जाना की तारीफ़ मुमकिन नहीं" :-)

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