लिखना है नारी की कहानी पर, और यह मेरी सबसे बडी परेशानी है कि कैसे लिखूँ, एक तो संशय है कि इस ब्लॉग पर यह मेरा पहला पोस्ट है, जाने क्या प्रतिक्रियायें आयेंगी, अरसा बीता गया इस तरह के मुद्दो पर लिखते हूए, और मैने पाया है कि जब भी किसी मुद्दे पर लिखा बोला जाता है तो जैसे सभी लोगो को हंगामा करने के लिये एक अच्छा विषय मिल जाता है, विषय भी ऐसा कि लोग चटखारे ले ले पढते हैं, सार्थक बहस तो होती नही, ऊपर से कई और तोहमत लगा दिया जाता है, बात मुद्दे से हटकर, व्यक्तिगत बन जाती है, लेखक या तो चुप हो जाये या फिर माँगी ना मान ले तब तक विचार-विमर्श बहस होता ही रहता है, बहस ऐसा कि आप या तो रो पडेंगे या फ़िर क्रोध से मर जायेंगे।
वास्तव मे मुझे डर इस बात का नही लग रहा है कि कितना विचार-विमर्श बहस होगा, डर इस बात का है कि इस बहाने कितनी ही औरतो का दर्द कुरेदा जायेगा, और उस पर कितने पूरूष अपने हाथ सेकेंगे और ये कहते दिखेंगे कि जाने ये औरते हर गम की जिम्मेदार पूरूषो को ही क्यों मानती हैं, ऐसा सोचते हूए घर तक जायेंगे और कहेंगे सुनती हो, आज ब्लॉग पर एक ब्लॉगर को खुब लपेटा, असहज सी अगडम-बगडम बाते बोलती है, और फिर अपनी भडास वहाँ भी निकालेंगे, युवक अपने दिल की भडास दुसरे दोस्तो से बाँटकर और लेखक के प्रति कुछ अपशब्द बोलकर निकालेंगे, बात इतनी बलवती होगी कि अब महिलायें भी अपना भडास निकालने से पीछे नही हटेंगी वो भी कही ना कही सुविचार विचार देते हूए मिल जायेंगी, अर्रे समाज की व्यवहारिकता को समझना ही पडता है, जो नही समझ सकता उसे इस तरह के तानो का शिकार तो होना ही पडेगा, फ़िर अब ये कहानी किसलिये लिखा जाये, जब अन्त मुझे अभी से दिख रहा है।
ऐसा नही कि नारी कहानी लिखने पर सिर्फ़ तर्क ही दिखेंगे, आपका साथ देते हूए साथ भी आयेंगे पर वो भी सार्थक चर्चा के लिये आये ऐसा नही है, कुछेक वाह-वाह बहुत अच्छा मुद्दा उठाया है, ऐसा बोलके निकल जायेंगे तो कुछ लोग कहेंगे आप घबडाईये मत, हम आपके साथ है।
इनमे बहूत कम लोग ऐसे होंगे जो वास्तव मे विषय की गम्भीरता को समझ पायेंगे।
पुरुष शत्रु नहीं मित्र हैं!
नारी की कहानी एक प्रयत्न ताकि एक मनुष्य (पुरुष) और दूसरे मनुष्य (महिला) में मन, कर्म, वचन का कोई भेद न रहे. ताकि हर संकीर्ण सोच पर पार पाकर सच्चा समाज स्थापित हो सके, और वर्षों से नारी पर डाली गयी धर्म, रिवाजों और समाज के बेडियाँ तोड़ कर बराबरी का हक़ मिले... प्रयत्न आपकी सहभागिता के बिना अधुरा है.. आपके सहयोग की लालसा में..
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6 comments:
इनमे बहूत कम लोग ऐसे होंगे जो वास्तव मे विषय की गम्भीरता को समझ पायेंगे।
" dont worry, pls go ahead with your thoughts about the topic. and be ready to bear that coments on the post may be more negative than postive and supportive. So what???? you have to go ahead in any case. all the best"
Regards
आपकी बात सत्य है, बहुत कम लोग ही विषय की गम्भीरता को समझ पाते हैं। पर यह सोच कर कि ऐसे लोग कम हैं, हम कुछ पाजिटिव कर ही नहीं पाएंगे। बहरहाल, आपका ब्लॉग जगत में स्वागत है।
बेहतर लेख। बेहतर ब्लॉग। विषय गंभीर है और गंभीरता से ही बात होनी चाहिए। आप लिखें और खुलकर लिखें। जिन्हें तकलीफ है उन्होंने अपनी बेबाक राय से और वैचारिक तकलीफ पहुंचाएं। शुभकामनाएं।
चिन्तन प्रधान लेख लिखा है आपने। बधाई।
aisa sabhi jagah hota hai.chourahe wali bahas par bhi.aap likhiye aapka swagat hai.
गरिमा जी,
सचमुच आपका लेख बहुत आकर्षक है, और जिस कदर आप अपनी बात को रखने मैं असफल हुई हैं. उससे आपकी प्रतिभा की भी बखूबी झलक मिलती है.अपने अपने विचारों से खोखलेपन को जाहिर करना का सुगम प्रयास किया है. अपनी लेखनी की तलवार चलाती रहें..
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