पुरुष शत्रु नहीं मित्र हैं!

नारी की कहानी एक प्रयत्न ताकि एक मनुष्य (पुरुष) और दूसरे मनुष्य (महिला) में मन, कर्म, वचन का कोई भेद न रहे. ताकि हर संकीर्ण सोच पर पार पाकर सच्चा समाज स्थापित हो सके, और वर्षों से नारी पर डाली गयी धर्म, रिवाजों और समाज के बेडियाँ तोड़ कर बराबरी का हक़ मिले... प्रयत्न आपकी सहभागिता के बिना अधुरा है.. आपके सहयोग की लालसा में..

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Tuesday, July 15, 2008

नारीवाद खतरनाक तो नहीं?

ब्लॉग की दुनिया तो महज़ एक उदाहरण है, आजकल इस संसार में और खासकर भारत में नारीवाद में तेजी से वृद्धि दिखाई दे रही है. महिलाओं को सशक्त होता देखना सचमुच रोमांचक और ख़ुशी देने वाला है. आखिर हम भारतवासी तो सदियों से महिलाओं की बराबरी की बात करते हैं.. 'अर्धांगिनी' शब्द या सिद्धांत शायद इसी बात को पुष्ट और परिभाषित भी करता है... परन्तु साथ ही महिलाओं को पहले अघोषित फिर घोषित तौर पर पुरुषों से कम योग्य बता दिया. कमोबेश स्तिथि यहाँ तक अ गयी की पुरुष महिलायों के लिए स्वामी बन गये..तथा महिलाओं उनके लिए कुछ कारणों मात्र का साधन.. भले ही पुरुष औरर महिलाएं एक दूसरे के पूरक हों तथा प्रभु ने दोनों को अलग कारणों से बनाया हो..परन्तु मनुष्य मात्र में यह खाई बड़ती गयी.. और आज हम देख सकते हैं की पशुओं में मादाओं का भी समान महत्व है और कुछ विशेष स्थानों पर नर से भी ज्यादा.....

लेकिन आप कब तक किसी को दवा सकते हैं, आखिर लावा फूट पडा और महिलाएं एकजुट व सशक्त हो कर उबार रही है.. हर कम में पुरुषों की न सिर्फ बराबरी का रही हैं बल्कि उनसे श्रेष्ठ भी साबित हो रही हैं.. शायद अब पुरुषों को भी वस्तुस्थिति का आभास हो चूका है.. ऐसे में दुखद बात यह है कि महिलाएं अब न्याय की लडाई अन्याय के विरुद्ध न लड़कर पुरुषों के खिलाफ अपनाती जा रही हैं.. कहीं यह कह्तार्नक साबित न हो ..समूचे मानव इतिहास के लिए.. बराबरी की दुनिया में क्या वर्चस्व को जगह मिल सकती है...

प्रश्न कायम है.. उत्तर की प्रतीक्षा है...

4 comments:

शोभा said...

सनील जी
आप एकदम सही कह रहे हैं। नारी सशक्तीकरण का अर्थ ये बिल्कुल नहीं है कि वे पुरूषों के विरूद्ध हो जाएँ। विरोध अन्याय का ही होना चाहिए चाहे वो नारी करे या नर।

रचना said...

मुझे नहीं लगता कोई भी महिला पुरूष के खिलाफ लड़ रही हैं . ये मिथ्याभ्रम पुरुषों आप जैसे पुरुषवादी पुरुषों नए फैलाया हैं जो अंदर से नारी के विरोधी हैं और बार बार ये सब कह वैमनस्य को बढ़ावा देते हैं ताकि पुरूष समाज ये समझे की नारी उनके ख़िलाफ़ आन्दोलन कर रही हैं . नारी का संघर्ष रुदीवाद्दी सोच के खिलाफ हैं जो उसको अपनी मर्जी का जीवन जीने का अधिकार नहीं देती . समाज मे नारी पुरूष और हमारी मान्यताये तीनो हैं और नारी का सश्क्तीकर्ण तभी होगा जब वोह संघर्ष करे और समाज मे ५०% की हिस्सेदारी का दावा करे . और ये दावा वो बिना पुरूष के के अहेम को बढ़ावा देकर और वही नारी कर सकती हैं जो पुरूष का इस्तमाल नहीं करती . बेफिजूल उसके अहेम को नहीं बढाती और अपनी सुविधा के लिये उससे डरने का नाटक नहीं करती . बस ये जरुरी हैं की पहले नारी इमानदार हो जाए तब ये दावा करे . लड़ाई पुरूष से नहीं हैं सो बार इस बात को जो पुरूष उठा रहे हैं वो अंदर से आतंकित हैं

anitakumar said...

हम शोभा जी से सहमत हैं। सवाल नर या नारी का नहीं ताकत के खेल का है।

राज भाटिय़ा said...

सुनील जी मे तो एक नारी जो जानता हु, जो बिलकुल भी खतरनाक नही, बल्कि बहुत ही बच्चो सी हे, वो हे आप की भाभी, भाई हमे तो अपने घर की पडी हे, अब नारी वाद या साडी वाद से हमे क्या लेना

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