कुछ दिन पहले की बात है. मैं हरियाणा के एक गाँव में गया. दिल्ली से कुछ ही दूर. में वहन अपने एक दोस्त के साथ गया था क्योंकि वहाँ एक फक्ट्री बंद हो जाने के कारण बहुत से लोग बेरोजगार हो गये थे. चूँकि मैं पत्रकारिता इ जुदा हूँ इसलिए वहाँ के लोगों का दर्द उजागर करना मेरा फ़र्ज़ था. वहाँ जाकर मैंने देखा कि बेरोजगार हो चुके मर्द हुक्के और ताश कि महफिल जमा कर अपना धुखडा रोते थे. और उनकी पत्नियाँ सारा काम करती थी. हमने गौर किया कि महिंलाओं कि जिंदगी सूरज निकले से पहले शुरू हो जाती है. घर में झाडू-पोचा करके लकडी काट कर चूल्हा जलती हैं. पुरे घर के लिए खाना बनाकर, उन्हें खिला कर फिर उन्हें खाना नसीब हिओता है. उसके बाद पशुओं के लिए घास काटने का काम, साथ ही पानी भरना और न जाने कितने काम.. सब लिखने बैठूँगा तो न जाने कितने पेज भर जाएँ..
जबकि सारा दिन मर्द खाते पीते और पडे रहते शाम को उनकी महफिलें शुरू हो जाती... हमने उसे पुछा कि आप क्यों अपनी पत्नियों कि मदद करते हैं.. तो अधिकतर का कहना था कि कुछ काम सिर्फ महिलाओं के लिए होते हैं.. और चाहे हम दिन भर बेकार बैठे रहें महिलाओं के काम तो महिलाऐं ही करेंगी..
काश! यह एक गाँव कि कहानी होती. अफ़सोस पुरे हिंदुस्तान कि यही कहानी है. हाँ, पड़े लिखे परिवारों में यह बात जरूर काम है. मेरे अपने घर में मैंने पिता जी को खाना बनाते, कपडे धोते, पानी भरते देखा है. लेकिन अभी भी ऐसे घर हमारे पहाडों में हैं जहाँ महिलाओं को ऊँचे पेड़ों पर से लकडी काट कर लानी होती है.. और सब काम करने होते हैं..और मर्द रोटियां फाड़ते हैं..
शिक्षा कि व्यार पहुँचने के साथ फर्क आता है लेकिन यह धरना ख़त्म नहीं होती कि कुछ काम सिर्फ महिलाओं के लिए होते हैं.. इसकी झलक उन परिवारों में मिलती है जहाँ पति पत्नी दोनों काम करते हैं..
हमारे कार्यालय में काम करने वाली ऐसे महिलाएं अक्सर बताई हा कि उन्हें घर जाकर सब काम करने पड़ते हैं क्योंकि नोकरों पर १००% निर्भर नहीं रहा जा सकता...
सार्थक संवाद कि आशा से आपके सामने यह बात रख रहा हूँ,.
पुरुष शत्रु नहीं मित्र हैं!
नारी की कहानी एक प्रयत्न ताकि एक मनुष्य (पुरुष) और दूसरे मनुष्य (महिला) में मन, कर्म, वचन का कोई भेद न रहे. ताकि हर संकीर्ण सोच पर पार पाकर सच्चा समाज स्थापित हो सके, और वर्षों से नारी पर डाली गयी धर्म, रिवाजों और समाज के बेडियाँ तोड़ कर बराबरी का हक़ मिले... प्रयत्न आपकी सहभागिता के बिना अधुरा है.. आपके सहयोग की लालसा में..
Friday, June 27, 2008
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
4 comments:
एक पुरुष होकर आप महिलाओं की बराबरी के लिए लिखते हैं.. आप सचमुच महान हैं
सचमुच आपने समाज की कलियाँ खोल कर रख दी हैं. धन्यवाद
ये महिलाएँ कभी हड़ताल क्यों नहीं करतीं?
सुनील पहले शादी करो फ़िर पुछुगा आटे दाल का भाव, अभी तो खुब लिखो नारियो पर मियां जब वस्ता पडेगा तो नानी याद ना आ जाये तो बताना, किसी शादी शुदा से पूछो मां बडी या वीवी ओर यह सवाल उसकी मां ओर वीवी के सामने पुछना.
Post a Comment