पुरुष शत्रु नहीं मित्र हैं!

नारी की कहानी एक प्रयत्न ताकि एक मनुष्य (पुरुष) और दूसरे मनुष्य (महिला) में मन, कर्म, वचन का कोई भेद न रहे. ताकि हर संकीर्ण सोच पर पार पाकर सच्चा समाज स्थापित हो सके, और वर्षों से नारी पर डाली गयी धर्म, रिवाजों और समाज के बेडियाँ तोड़ कर बराबरी का हक़ मिले... प्रयत्न आपकी सहभागिता के बिना अधुरा है.. आपके सहयोग की लालसा में..

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Monday, June 2, 2008

मुसीबत का दूसरा नाम लड़की!

यूरोप के एक बडे देश के एक निसंतान दंपत्ति ने कृत्रिमगर्भधारण के जरिये संतान सुख पाने के लिए दिल्ली का रुख किया. टेस्ट ट्यूब तकनीक के जरिये उनकी मनोकामना पूरी भी हो गयी लेकिन जब बच्चे का जन्म हुआ तो वह 'बेटी' थी, विदेशी दंपत्ति वापस चला गया और अस्पताल में छोड़ गया उस बिलखती बच्ची को.....

सिर्फ इसलिए क्योंकि वह लड़की थी, मैं आज तक यह समझ नहीं पाया हूँ की लड़की में ऐसी क्या मनहूसियत होती है जो सदा से ही वो नकारी जाती है. लेकिन जरा गौर कीजिए, उक्त दंपत्ति में भी तो एक लड़की थी, जिसने मां कि भूमिका निभाई थी.. ऐसे में तो एक ही कारण हो सकता है कि उस मां ने यह सोच कर नवजात लड़की को नहीं अपनाया होगा कि उसकी हालत ठीक नहीं है अर्थात वो महिला खुद दुनिया से हार मान कर अपनी बच्ची को नहीं अपनाना चाहती क्योंकि शायद उसने समाज को औरत के साथ अच्छा बर्ताब करते नहीं देखा और घुटने टेक दिए...

ऐसे में तो साफ है कि महिला कि कमजोरी के पीछे भी महिला है. अगर समाज चलाने के लिए, जीवन के लिए महिला और पुरुषों का बराबर होना जरूरी है तो क्यों महिला खुद को पीछे पाकर खामोश रहती है.. खासकर अब, जब यह समाज पुरुष प्रधान होने का लेबल उतरने को तैयार है..
अब तो वो जमाने भी गए जब महिलाओं को सिर्फ चारदीवारी के अंदर रहना होता था... जहाँ तक मैं समझता हूँ, जो महिला प्रयत्न करती है आगे बढती है और यह बात सब पर लागू है. समाज भी हमसे ही बनता है ना

अगर उस माँ ने अपनी बेटी को अपनाने का हाथ किया होता तो शायद एक नन्ही जान को बोझ नहीं कहलाना पड़ता.. ..

4 comments:

भूमिका said...

पुरुष होकर महिलाओं के बारे मैं आप सोचते हैं, बहुत बड़ी बात है.. आपका असर जरूर होगा.. शुभकामनायें

Anonymous said...

good,
This prob is world wide....
but your practice is going to do something

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा विचारणीय एवं सार्थक लेखन के लिए बधाई.
निश्चित ही आप हम से ही समाज बनता है. सबको ही सोचना होगा.

परिवर्तन आने लगे हैं. इस तरह की घटनाओं में और कन्याओं के प्रति व्यवहार में सकारात्मक बदलाव आया है. भविष्य अच्छा ही होगा, यही कामना है.

mehek said...

nie to see this article,the time is changing slowly,and wil change oneday,ladki hona koi abhishap nahi hai,haa us maa ko apni beti chodkar nahi jana chahiye tha,ye sahi hai.

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