एक और बहस हो रही थी. वही घिसा-पिटा सवाल पूछा जा रहा था कि शादीशुदा महिलाएं बिंदिया लगती हैं, मांग में सिन्दूर सजाती हैं, मंगलसूत्र पहनती हैं, कुल मिला कर उन्हें आसानी से पहचान कर पता लगाया जा सकता है वह शादीशुदा हैं या नहीं. लेकिन मर्दों को पहचानना मुश्किल है, किसी भी पुरुष को देख कर आप पता नहीं लगा सकते कि वह शादीशुदा है या नहीं.... कुछ तथाकथित आधुनिक लोग सलाह देते हैं कि शादीशुदा मर्द ऐसा करें, वैसा करें...आदि. एक सुझाव जो अक्सर दिया जाता है वो यह कि शादीशुदा मर्द पांव में लोहे का कड़ा पहने.. कितना हास्यस्पद है.
पहली बात, मंगल सूत्र, सिन्दूर, बिंदिया आदि को इसलिए नहीं धारण किया जाता कि पता लगाया जा सके कि महिला विशेष विवाहित है या नहीं... अतः यह धारणा कि पुरुषों या महिलाओं को विवाहित होने कोई चिन्ह हमेशा अपने साथ टांग कर रखना चाहिए ...सरासर गलत है.
अब प्रश्न उठता है कि अगर उपयुर्क्त चीज़ें विवाहित महिला कि निशानी नहीं हैं तो इन्हें केवल शादीशुदा महिलाएं ही क्यों धारण करती हैं.. जहाँ तक मैं समझता हूँ तो यह चीज़ें महिला का श्रृंगार हैं, जिनसे महिलाओं कि सुन्दरता मैं चार चाँद लगते हैं.. चूंकि महिला को सुन्दर का अधिकार हैं अतः उसे इन सब चीजों को धारण करने का भी अधिकार है.. हमने तो यहाँ तक पढ़ा है कि पाषंड युग में महिलाएं हड्डियों से बने आभूषण पहनती थी.. अतः आभूषण इत्यादी महिला के सौन्दर्य को निखारने के लिए हैं ना कि किसी और वजह के लिए..
दुर्भाग्य से महिला सशक्तिकरण की बात करने वाले पुरुषों पर हर तरह के हमले करते हैं..और भूल जाते हैं कि पुरुष शत्रु नहीं मित्र हैं..
हाँ, यह सब चिन्ह कुछ ही धर्मों द्वारा इस्तेमाल किये जाते हैं, वैसे भी अगर किसी महिला को यह सब चीज़ें बोझ लगती हैं तो उसे इनका त्याग करना चाहिए..
पुरुष शत्रु नहीं मित्र हैं!
नारी की कहानी एक प्रयत्न ताकि एक मनुष्य (पुरुष) और दूसरे मनुष्य (महिला) में मन, कर्म, वचन का कोई भेद न रहे. ताकि हर संकीर्ण सोच पर पार पाकर सच्चा समाज स्थापित हो सके, और वर्षों से नारी पर डाली गयी धर्म, रिवाजों और समाज के बेडियाँ तोड़ कर बराबरी का हक़ मिले... प्रयत्न आपकी सहभागिता के बिना अधुरा है.. आपके सहयोग की लालसा में..
Tuesday, May 20, 2008
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4 comments:
yah koi sawal hi nhi hai,bilkul nizi mamala hai us aurat par chhod dena chahiye jise pahnana hai.koi jor jabrjasti nhi karani chahiye
kabhie samay ho toh varanasi / hariduar mae reh rahee vidhvaa strio sae puchey kyon unhey sar kae baal kataney padtey
kyon safed saadi pehni padtee haen
kyon jis din koi aurat vidwaa hotee haen usae "shingaar " kaa tyaag karna padtaa hae.
kabhie kabhie mehsoos hota haen purush samudaaye महिला सशक्तिकरण की बात करने वाले पुरुषों पर हर तरह के हमले करते हैं
yae likh likh kar apni taraf dhyaan aakarshit karna chahtaa heaen . महिला सशक्तिकरण samaj kii rudivaadi soch sae mahilla ki mukti kaa rastaa haen . aur samaj mae sirf purush nahin hotey . yae hee purush samudaay ka sabsey badaa bhram haen ki महिला सशक्तिकरण ka seedha laena dena unsey haen . aap nishchint raehey kyoki maere khyaal sae yae bhram kisi bhi purush kae liyae sahii nahin haen kyokii issi ki vajeh sae purush samudaaye baar baar apne "malik " honey kae ehsaas ko jeeta hae
haan ek baat aur jis prakaar sae shadii shuda mahilla kae liyae "shingaar " haen usi prakaar sae ek samy mae samaaj nae "virginity" kae liyae bhi " taale- chabi " bnaa rakhe thae. kabhie un sab vishcyo per bhi khoj karey kii jo niyam stri kae liyae baney hae is samaj mae purush kae liyae kyon nahin haen . "shingaar" karna naa karna apney haath mae haen per kitni mahilaa ko yae sab majburi mae bhi karnaa padtaa haen astha naa honey per bhi taaki unkae gharo mae shaantee rahey
औरत चाहे भी तो इन निशानियों का त्याग नही कर सकती,सामाजिक दबाव उसे ऐसा करते हुए कई बार ख़ुद को ही डराते हैं , लेकिन पुरूष पर इस तरह का कोई बन्धन नही है,,जब कि होना चाहिए, और नही है तो महिलाओं को भी इन बंधनों से आज़ादी दे देनी चाहिए...
यह वर्ग विभाजित समाज है। इस में शोषण के अनेक स्तर हैं। पुरुषों द्वारा महिलाओं का शोषण भी शोषण का एक स्तर है। अपवादों को छोड़ दें तो महिला किसी भी वर्ग की हो वह शोषित है।
लेकिन सभी प्रकार के शोषण का अन्त ही महिलाओं के शोषण का भी अन्त कर सकता है। जिस की बात भगत सिंह किया करते थे। इस कारण से महिलाओं की बराबरी की लड़ाई सभी प्रकार के शोषण से अन्त की लड़ाई का एक अभिन्न हिस्सा है। यदि कहीं वह ऐसा नहीं है तो फिर वह छद्म संघर्ष है। उसे भी बेनकाब होना चाहिए।
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