दो चार दिन पहले की बात है. मैं बस से कहीं जा रहा था. दिल्ली की बसों में बहुत भीड़ होती है. उस दिन भी बहुत ज्यादा भीड़ थी. लेकिन मुद्दा कुछ और है..
मैं सीट पर बैठा हुआ था.. तभी एक लड़की मेरे बगल मैं आ खड़ी हुई. चूंकि मैं नॉन-लेडीज सीट पर बैठा था इसलिए मैंने उसे सीट देना जरूरी नहीं समझा. साथ में एक सरदार जी भी खडे थे. उनकी उम्र पैंतालिस से कम न थी. कुछ देर बाद मैंने ध्यान दिया की लड़की सहज नहीं थी. शायद कुछ प्रेषण थी. बार बार सरदार जी की तरफ घूर घूर कर देख रही थी. लेकिन सरदार जी ध्यान नहीं दे रहे थे. पहले तो मैंने सोचा की शायद गर्मी की वजह से परेशान होगी. मेरा फ़र्ज़ था की में उसे सीट दे दूं लेकिन मैंने नहीं दी. कुछ देर बाद मैंने पाया की सरदार जी लड़की से छेड-छाड कर रहे हैं. वो बार बार लड़की की तरफ झुक रहे थे.. उसे छोने का प्रयास कर रहे थे.. शर्म और गुस्से के कारण मेरी आँखे लाल हो गयी... लेकिन में तो तब कुछ करता अगर लड़की सरदार जी पर आपत्ति जताती.. खैर लड़की को सीट देकर मैंने तो अपनी गलती सुधार ली. लेकिन एक बात सामने आ गयी की नौजवान ही नहीं अधेड़ लोग भी ऐसी हरकतें करते हैं..
बाद में मैंने घटना का जिक्र एकमहोदय से किया तो उन्होने कहा कि लड़कियों को सभी कपडे पहनने चाहिए. लेकिन मैं सोचता हूँ कि ऐसे मर्द क्या भूखे भेडियें हैं जो अपने ऊपर सभ्यता को दमन नहीं रख सकते..
महिला क्यों चुप है... लेकिन भला वो बोले क्या और किससे...
पुरुष शत्रु नहीं मित्र हैं!
नारी की कहानी एक प्रयत्न ताकि एक मनुष्य (पुरुष) और दूसरे मनुष्य (महिला) में मन, कर्म, वचन का कोई भेद न रहे. ताकि हर संकीर्ण सोच पर पार पाकर सच्चा समाज स्थापित हो सके, और वर्षों से नारी पर डाली गयी धर्म, रिवाजों और समाज के बेडियाँ तोड़ कर बराबरी का हक़ मिले... प्रयत्न आपकी सहभागिता के बिना अधुरा है.. आपके सहयोग की लालसा में..
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15 comments:
सुनील जी
आपका प्रयास तो सराहनीय है , और विचार भी पर यह बात समझ नही आयी -
"आपके विचारों का स्वागत है. इन्हें ब्लोग पर निशुल्क प्रकाशित किया जायेगा. "
स्वागत है इस नये ब्लॉग के साथ. शुभकामनाऐं.
i appreciate your attempt to write on woman oriented issuses with senstivity although i dont very much like the heading of this post . but many improvements keep coming with age and experience
such blogs will help in making man understand their faults and woman theirs
cheers keep the good work going
अच्छा लिखा है आपने...
यह दिल्ली की बस में एक आम बीमारी बन चुकी है कई बार तो भरी भीड़ देख के दहशत होने लगती है कि इस में छेड़ छाड़ करने का मौका जयादा मिल जाता है इस परकार के मानसिक लोगों को आपने काम तो प्रशंसा वाला किया है इस में कोई शक नही है ..पर आपने इस पोस्ट का टाइटल ठीक नही दिया है .नारी आफत की बीमारी ...यहाँ कौन कितना बीमार है वह आपकी पोस्ट ख़ुद बता रही है ..:) और अपने इस ब्लॉग का रंग थोड़ा हलका रखे इतने अच्छे विचारों को पढने में आंखो पर जोर पड़ता है :)
swagat hai aapka..aapne sarthak pahal ki hai mahilaon ke liye.kripya yah word verifaication hta len..
har samay mein har ladaki is chhed-chhad ke naarakiiy daur se guajarti hai. yah kahana apane aap mein bakavaas hai ki ladki poore kapade pahananaa siikhen. bitti umr ke log to aur bhi ghatak hote hain, napak haraqat karenge aur pol khulate hi beti- bahan jaise sambodhan se rishte ko bhi ochha bana deta hain.
सुनील जी आज मुड ठीक नही फ़िर भी आप को टिपाण्णी करने चला आया,
यह लडकी शरीफ़ घर की थी इस से ज्यादा कया करती, अगर हमे भी कोई गाली देता हे तो हम भी चुप रहते हे, क्यो कीचड मे हाथ मारे, अगर लडकी कुछ बोलती तो लोगो ने मासुम लडकी को ही बुरा कहना था,
ओर हा वहां बेठे उन मर्दो का काम था उस लफ़गें को सबक सीखाते, मेरे साथ एक बार ऎसा ही हुया था तो पुरी बस मे मेरे सिवा कॊई नही बोला था? जो काम मर्दो का उन्हे ही करना चहिये, चुप चाप बेठना क्या उचित हे,कल हमारी मां बहिन ओर बेटी भी हो सकती हे, इस लिये बिना डरे सब की मदद करनी चहिये, धन्यवाद
@सुजाता जी,
'आपके विचारों का स्वागत है. इन्हें ब्लोग पर निशुल्क प्रकाशित किया जायेगा' इसका अर्थ है की आप भी ब्लोग पर अपनी बात लिख सकते हैं.. मैं इस ब्लोग पर पोस्ट प्रकाशित करने का अधिकार बाँट कर प्रसन्नता महसूस करूँगा..
@lovely kumariजी मैंने वर्ड वरिफिकेशन नहीं लगा रखी है.. अगर कोई तकनिकी समस्या है तो हल सुझाएँ...
शेष सभी को बहुत बहुत धन्यवाद
nice.......
सुनील जी
आप एकदम सही कह रहे हैं। ऐसी घटनाएँ अक्सर होती हैं अगर आप जैसी सोच हर भाई अपना ले तो समाज में महिलाओं का जीना बहुत आसान हो जाए। एक नेक काम के लिये बधाई।
समस्या तो है,
समाधान भी है,जनता जागरूक हो और लड़कीयाँ ज्यादा फैशन न करें तो समस्या कुछ हद तक सुधर सकती है।
ब्लाग जगत मे स्वागत है आपका,निरंतर लिखें।
यह कोई आज की या दिल्ली की बात नही है चालीस साल पहले कलकत्ता के बसों में भी यही सब होता था तब तो एसा कोई फेशन को भी दोष नही दिया जा सकता था । और मेरा तो मानना है कि जवान तो एक बार को फिर भी संयम रख लें, लडकियों को अधेड और बूढों से ज्यादा खतरा होता है । आपके लेख के लिये धन्यवाद । पर आपको सीट जल्दी देना चाहिये थी । और हाँ ब्लॉग का नाम बदले तो अच्छा अभी थोडा निगेटिव है ।
महिलाओं को चुपचाप सबकुछ सहते रहना प्रताड़ना को बढावा देना है
http://popularindia.blogspot.com/2007/10/blog-post_22.html
बहुत सही लिखा है। सुनील बधाई स्वीकार करें। ये तो रोज़ की बात हो गयी है साहब
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