
नवमी की रामलीला खत्म हो गई। अगले दिन रावण का पुतला भी जल गया। महफिल में मौजूद किसी मासूम बच्चे ने अपने बाबा से पूछा- दादा अब क्या होगा। दादा बोले, `अब क्या! भगवान राम दीवाली पर अयोध्या लौट कर रामराज्य चलायेंगे। हम्म्म! मेरा मन हमेशा की तरह स्तब्ध रह गया। तो वह था रामराज्य! फिर तौ तौबा है। कब तक हम उस सच को नजरअंदाज करते रहेंगे जो रावण की मौत के बाद घटित हुआ था।
.......वानरसेना रावण की मौत का जश्न मना रही थी। विभीषण के राजतिलक की तैयारियां चल रही थी। अशोक वाटिका में विरह जीवन में तडप रही सीता का निर्वासन खत्म हो गया। राम और सीता के मिलन का प्रेममय समय आ गया। होना तो यह चाहिए था कि देव, यक्ष, गंधर्व और भगवान इन लम्हों का दीदार करने के लिए इंतजार करते और फूलों की बारिश करते। लेकिन यह क्या! यहां तो विराना छा गया। प्रियवर से मिलने के लिए आ रही सीता को मर्यादा पुरूषोत्तम ने अचानक रोक दिया। लक्ष्मण से कहा कि आग जलाओ। सीता को अग्नि परीक्षा देनी होगी। वह परपुरूष के सानिध्य में रहकर आई है। .....अग्नि परीक्षा! लक्ष्मण का स्वर तक कांपने लगा। हर शख्स सन्न रह गया। लेकिन लक्ष्मण से बडा भाई का भक्त तो दूसरा कोई हुआ ही नहीं। वैसे भी स्त्री के दर्द को लक्ष्मण कब समझ सके थे। वरना भाईप्रेम कर महान मिशाल पेश कर वनवास धारण करने वाले लक्ष्मण अपनी धर्मपत्नी को वियोग में अकेला छोड करने नहीं आते। यह भी त्रासदी ही है कि राम और सीता के वियोग को तो सब की सहानुभूमि मिली लेकिन अयोध्या के राजमहल में आसूं भी बहाने में अक्षम लक्ष्मण की जीवनसंगिनी के दुख का हाल किसी ने नहीं पूछा।
और सीता.... उसको भी कब किसने पूछा था। इस बार भी उसकी हालत का जायजा लेने वाला कोई भी नहीं था। खैर आग जली। सीता जलती लपटी के बीच से गुजर कर आई। लेकिन जली नहीं। उनकी शान में आंच भी नहीं आ सकी। शायद आग भी स्त्री होती है तभी सीता का दर्द समझ पाई होगी। फिर हुआ मिलन। लेकिन अब तो सब बेमतलब था। बहरहाल, औरत को हक ही नहीं होता कि अपना कचोट, अपना अपमान, अपना दर्द याद करने का। खासकर जब दोषी कोई और नहीं बल्कि उसका पति हो। प्रभु की टोली अयोध्या पहुंची। जोरदार स्वागत हुआ। श्रीराम का राजतिलक हुआ और आया रामराज्य! रामराज्य का अर्थ?
अयोध्या बहुत अच्छी नगरी है। सत्ता में रहने वाले लोग इस जगह का विशेष ख्याल रखते हैं। आज भी आप जायें वहां तो छावनी से भी ज्यादा जवान नजर आयेंगे। तब भी हालात जुदा न थे। श्रीराम तो थे ही प्रजा के सच्चे रखवाले। उन दिनों सीता गर्भवती थी। राम बहुत खुश थे। इसी दौर में एक बार संध्या समय नगरी के गुप्त भ्रमण को निकल गए प्रभु। सरयु नदी के तट पर जहां एक ओर दशरथपुत्र का राजमहल था तो दूसरी ओर विशाल नगर। राम चले जा रहे थे। रास्ते में एक गरीब धोबी की कुटिया थी। धोबी अपनी पत्नी को घर से बाहर निकाल रहा था। कह रहा था अरे मैं कोई राम नहीं हूं जिसकी पत्नी को कोई उठा कर ले गया और उसने फिर उसको घर में रख लिया। राजा राम सन्न रह गये। उन्होंने उसी क्षण न्याय किया। ना ना... धोबी को दंड नहीं दिया बल्कि पत्नीव्रत राम ने सीता को तुरन्त घर से निकालने का फैसला किया। पल भर के लिए सोचिए! राम और धोबी में कौन श्रेष्ठ था! मेरी बुद्धि अल्पविकसित है लेकिन मैं इतना जानता हूं कि दोनों ने अपनी पित्नयों को घर से निकाल दिया लेकिन धोबी ने अपनी पत्नी की अग्नि परीक्षा नहीं ली। खैर, राजा जनक की बेटी गर्भवती बेटी सीता एक बार फिर जंगलों में ठोकरें खाने के लिए छोड दी गई। जय श्री राम!
कुछ दिन बाद राजा राम ने अश्वमेद्य यज्ञ कराने का फैसला किया। लेकिन एक अडचन आ गई। इस यज्ञ में पत्नी कर साथ होना आवश्यक था। राम यहां भी एक मिशाल पेश कर गये। उन्होंने सीता को नहीं खोजा। खोजते भी कैसे। श्रीराम ने सीता की सोने की प्रतिमा बनवाई उसे यज्ञ मंडप में बिठाया। प्रभु भक्तों को रास्ता बता गये और स्त्री को औकात।
हां, सीता का क्या हुआ। इससे पहले की अयोध्या की राजशाही फिर उनका अपमान करती सीता इतिहास बन गई। अतं में सीता को शरण देने वाला कोई पुरूष नहीं था। धरती फटी और सीता उसी में समा गई। मैं आस्तिक हूं। लेकिन मेरा मन पूछता है कि राम का पुतला कब जलेगा। मां सीता मुझे क्षमा कर देना।

